Deepfake Detection Tool: यूट्यूब ने लॉन्च किया नया AI फीचर, अब इन चुनिंदा लोगों के नकली वीडियो पकड़ना हुआ आसान

Suyash Pandey
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीSuyash Pandey
Wed, 11 Mar 2026 04:36 PM IST
सार

Youtube Deepfake Detection System: यूट्यूब ने एआई से बने नकली वीडियो (डीपफेक) पर लगाम कसने के लिए अपना नया लाइकनेस डिटेक्शन टूल पेश किया है। इसकी मदद से अब नेता, पत्रकार और मशहूर हस्तियां आसानी से पकड़ सकेंगी कि कहीं उनकी शक्ल या आवाज चुराकर कोई फर्जी वीडियो तो नहीं बनाया गया है।

YouTube Expands AI Deepfake Detection Tool to Help Public Figures Spot Fake Videos
यूट्यूब (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एक्स

    विस्तार

    दुनिया के सबसे लोकप्रिय वीडियो प्लेटफॉर्म यूट्यूब ने फेक न्यूज और एआई-जनरेटेड वीडियो (डीपफेक) से लड़ने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने अपने एआई-पावर्ड 'डीपफेक डिटेक्शन सिस्टम' का दायरा बढ़ा दिया है। अब राजनेता, सरकारी अधिकारी और पत्रकार आसानी से पता लगा सकेंगे कि कहीं उनकी शक्ल या आवाज का इस्तेमाल करके कोई नकली वीडियो तो नहीं बनाया गया है। आइए समझते हैं कि यह नया सिस्टम क्या है और कैसे काम करता है।

    डीपफेक वीडियो का बढ़ता खतरा

    आजकल एआई की मदद से किसी की भी शक्ल और आवाज की हूबहू नकल करके वीडियो बनाना बहुत आसान हो गया है। इन्हें डीपफेक कहा जाता है। स्कैमर्स इन वीडियो का इस्तेमाल झूठी खबरें फैलाने, चुनाव के समय जनमत को भड़काने या किसी की छवि खराब करने के लिए करते हैं। इसी खतरे को रोकने के लिए यूट्यूब यह टूल लाया है।

    कैसे काम करता है 'लाइकनेस डिटेक्शन' टूल?

    यूट्यूब के इस नए फीचर को लाइकनेस डिटेक्शन का नाम दिया गया है। यह टूल काफी हद तक यूट्यूब के कंटेंट आईडी सिस्टम की तर्ज पर ही काम करता है। ठीक वैसे ही जैसे वह गानों या फिल्मों की कॉपीराइट चोरी पकड़ता है। इस नए सिस्टम के तहत, जब भी प्लेटफॉर्म पर कोई नया वीडियो अपलोड होता है। तो यह एआई तकनीक उसे स्कैन करके यह चेक करती है कि कहीं उसमें किसी रजिस्टर्ड व्यक्ति का चेहरा या हुलिया एआई की मदद से तो नहीं बनाया गया है। स्कैनिंग के दौरान अगर सिस्टम को ऐसा कोई नकली या डीपफेक वीडियो मिलता है तो वह तुरंत उस असली व्यक्ति को अलर्ट भेज देता है। अलर्ट मिलने के बाद, वह व्यक्ति खुद उस वीडियो को देखकर तय कर सकता है और अगर उसे यह गलत लगता है तो वह यूट्यूब से उसे हटाने की रिक्वेस्ट कर सकता है।

    इस सिस्टम के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे होगा?

    इस सिस्टम की शुरुआत अक्तूबर 2025 में हुई थी, जब यूट्यूब ने इसे अपने करीब 40 लाख क्रिएटर्स के लिए रोलआउट किया था। अब कंपनी इसका दायरा बढ़ाते हुए राजनेताओं और पत्रकारों जैसी सार्वजनिक हस्तियों (पब्लिक फिगर्स) से भी संपर्क कर रही है। इस खास टूल से जुड़ने का तरीका बेहद आसान और पूरी तरह से सुरक्षित रखा गया है। इसके लिए उपयोगकर्ता को बस अपना एक छोटा-सा वीडियो सैंपल देना होगा और साथ ही सरकार के जरिए जारी कोई पहचान पत्र अपलोड करना होगा। इसके अलावा, यूट्यूब ने यूजर्स की डेटा प्राइवेसी को लेकर भी पूरी गारंटी दी है। कंपनी ने साफ तौर पर कहा है कि वेरिफिकेशन के लिए दिए गए आपके वीडियो या आईडी का इस्तेमाल सिर्फ इसी डिटेक्शन सिस्टम को चलाने के लिए किया जाएगा। आपके इस पर्सनल डेटा का उपयोग गूगल के किसी भी एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए बिल्कुल नहीं किया जाएगा।

    क्या हर नकली वीडियो हटा दिया जाएगा?

    यूट्यूब का कहना है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा सम्मान करता है। अगर किसी ने कोई वीडियो सिर्फ मजाक, व्यंग्य या आलोचना के लिए बनाया है और वह यूट्यूब के नियमों के दायरे में है तो उसे प्लेटफॉर्म से नहीं हटाया जाएगा।

    भविष्य में और क्या-क्या नया आएगा?

    यूट्यूब के के मुताबिक, यह सिस्टम अभी सिर्फ एक शुरुआत है और आने वाले समय में इसमें कई बड़े अपडेट्स देखने को मिलेंगे। फिलहाल यह टूल मुख्य रूप से चेहरे की समानता को ही पहचानता है लेकिन जल्द ही इसमें आवाज की पहचान का फीचर भी जुड़ जाएगा। इससे यह आवाज की नकल को भी पकड़ने में सक्षम हो जाएगा। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भविष्य में यूजर्स को इससे कमाई का नया मौका भी मिल सकता है। यानी अगर कोई व्यक्ति आपके चेहरे या आवाज का इस्तेमाल करके कोई एआई वीडियो बनाता है। तो आपके पास यह विकल्प होगा कि आप उसे डिलीट करवाने के बजाय उस वीडियो से होने वाली कमाई में अपना हिस्सा मांग लें।