जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है
इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए
- सऊद उस्मानी
वस्ल को मौक़ूफ़ करना पड़ गया है चंद रोज़
अब मुझे मिलने न आना अब कोई शिकवा नहीं
- अज्ञात
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा
- शहरयार
कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए
लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता
- नसीर तुराबी
कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए
रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
- नासिर काज़मी
अफ़्सोस ये वबा के दिनों की मोहब्बतें
इक दूसरे से हाथ मिलाने से भी गए
- सज्जाद बलूच
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