जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है
इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए
- सऊद उस्मानी
वस्ल को मौक़ूफ़ करना पड़ गया है चंद रोज़
अब मुझे मिलने न आना अब कोई शिकवा नहीं
- अज्ञात
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा
- शहरयार
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