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Urdu Poetry: उबैदुल्लाह अलीम की ग़ज़ल- कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी

उर्दू अदब
                
                                                         
                            कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया 
                                                                 
                            
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझ को मार दिया 

इक सब्ज़ शाख़ गुलाब की था इक दुनिया अपने ख़्वाब की था 
वो एक बहार जो आई नहीं उस के लिए सब कुछ हार दिया 

ये सजा-सजाया घर साथी मिरी ज़ात नहीं मिरा हाल नहीं 
ऐ काश कभी तुम जान सको जो इस सुख ने आज़ार दिया 

मैं खुली हुई इक सच्चाई मुझे जानने वाले जानते हैं 
मैं ने किन लोगों से नफ़रत की और किन लोगों को प्यार दिया 

वो इश्क़ बहुत मुश्किल था मगर आसान न था यूँ जीना भी 
उस इश्क़ ने ज़िंदा रहने का मुझे ज़र्फ़ दिया पिंदार दिया  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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