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Jaan Nisar Akhtar: जाँ निसार अख़्तर की ग़ज़ल 'तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है'

jaan nisar akhtar ghazal tu iss qadar mujhe apne qareeb lagta hai
                
                                                         
                            

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है
 
जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार
वो शख़्स मुझ को बहुत बद-नसीब लगता है
 
हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा
न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है
 
ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है
 
उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है

2 वर्ष पहले

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