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स्वप्निल तिवारी: रंग हो मजनूँ और लैला पर बरसे रंग

उर्दू अदब
                
                                                         
                            इश्क़ की इक रंगीन सदा पर बरसे रंग 
                                                                 
                            
रंग हो मजनूँ और लैला पर बरसे रंग 

कब तक चुनरी पर ही ज़ुल्म हों रंगों के 
रंगरेज़ा तेरी भी क़बा पर बरसे रंग 

ख़्वाब भरें तिरी आँखें मेरी आँखों में 
एक घटा से एक घटा पर बरसे रंग 

इक सतरंगी ख़ुश्बू ओढ़ के निकले तू 
इस बे-रंग उदास हवा पर बरसे रंग 

ऐ देवी रुख़्सार पे तेरे रंग लगे 
जोगी की अलमस्त जटा पर बरसे रंग 

मेरे अनासिर ख़ाक न हों बस रंग बनें 
और जंगल सहरा दरिया पर बरसे रंग 

सूरज अपने पर झटके और सुब्ह उड़े 
नींद नहाई इस दुनिया पर बरसे रंग 

2 वर्ष पहले

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