ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता
अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है
~ अख़्तर सईद ख़ान
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
~ इफ़्तिख़ार आरिफ़
तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
~ इरफ़ान सिद्दीक़ी
कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
~ मिर्ज़ा ग़ालिब
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