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वो कहते थे मुझे वाहिद भाई कहा करो अच्छा लगता है: अनुपम पाठक 'अनुपम'

कहते थे मुझे वाहिद भाई कहा करो अच्छा लगता है: अनुपम पाठक 'अनुपम'
                
                                                         
                            मेरा सबसे पहला प्यार रेडियो है, दूसरा हिंदी और तीसरा सबसे निकटवर्ती महबूब थे वाहिद.. जो सबसे पहले बेवफा हो गए, छोड़कर चले गए न जाने किस देश। मैंने आकाशवाणी लखनऊ 5 साल की उम्र से सुनना शुरू किया ..उस समय उस समय 1 बजे देशगान में एक गीत गूंज उठता था 'इस देश का है मान व सम्मान तिरंगा' जिसे सुनकर रोम-रोम रोमांचित हो जाते तब मैं इतना छोटा था कि मुझे कविता के लय और भाव के अतिरिक्त कुछ न पता था, बड़ा हुआ तो पता चला ..इस देशगान के रचयिता ...वाहिद  अली वाहिद हैं। 
                                                                 
                            

और तब से मैं देश इस कवि और देशभक्ति को एक पर्यायवाची मान बैठा और सच कहूं तो वाहिद साहब ने कभी निराश न होने दिया। उनके एक एक छंद में भारत बोध स्पष्ट परिलक्षित होता है, जिस युग में  वे कविता के उच्च शिखर पर थे वो दौर मजहबी भिड़ंतों का दौर था, सम्प्रदायिकता चरम पर थी और जब ऐसा होता है तो किसी कबीर किसी रहीम या किसी रसखान को कलम को पतवार की तरह उठाना पड़ता है ताकि देश और समाज को साम्प्रदायिकता के मंझधार से निकाला जा सके, वाहिद उनमें से थे जिन्होंने न केवल वह पतवार थामी बल्कि उसके सबसे बड़े नाविक बने रहे उम्र के आखिरी क्षण तक।  आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

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