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शायद इसीलिए इब्ने इंशा बार-बार मीर को करते हैं याद

इब्ने इंशा
                
                                                                                 
                            हिंदी में कबीर और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अवधूत की तरह थे। इन्होंने अपने काव्य के जरिए सामाजिक कुरीतियों पर खुलकर करारे प्रहार किए। उर्दू साहित्य में ठीक इसी तरह मीर और नजीर हुआ करते थे। कालांतर में हिंदी में नागार्जुन और उर्दू में इब्ने इंशा ने कबीर और मीर की साहसिक पंरपरा का निर्वहन किया। राजकमल प्रकाशन दिल्ली की किताब इब्ने इंशा-प्रतिनिधि कविताएं की भूमिका में अब्दुल बिस्मिल्लाह लिखते हैं कि जीवन-दर्शन और जीवन-सौंदर्य के सामंजस्य से जो कविता फूटती है, वही असली कविता होती है। लेकिन दर्शन और सौंदर्य के अलावा कविता में जब रस और गंध भी हो तो वह किसी भी परिभाषा से परे हो जाती है। वह सिर्फ कविता होती है। ऐसी कविता तन में फुरफुरी और मन में द्वंद मचा देती है। कबीर और मीर ने ऐसी कविताएं रची हैं। इसके बाद नागार्जुन और इब्ने इंशा ने कविता में ऐसा साहस प्रकट किया है। इंशा ने जीवन के सच की एक रुहानियत अंदाज में खोज की। इब्ने इंशा वैसे अपने काव्य के जरिए नजीर और फैज को भी याद करते हैं, पर दुआ सिर्फ मीर के लिए मांगते हैं। और वह इसकी पूरी वजह भी बताते हैं। वह लिखते हैं-
                                                                                                


'अल्लाह करे मीर का जन्नत में मकां हो,
मरहूम ने हर बात हमारी ही बयां की'


बिस्मिल्लाह ने आगे इसी भूमिका में लिखा है कि मीर, नजीर और कबीर की परंपरा का निर्वहन करने वाले इंशा उर्दू के निराले कवि हैं। इंशा ने उर्दू शायरी के प्रचलित विन्यास को हाशिए में डाल दिया। उन्होंने अपनी शायरी में एक नया सौंदर्य-बोध स्थापित किया। यही वजह है कि इब्ने इंशा की कविताओं में मिट्टी की खूश्बू है, जो आषाढ़ की पहली बारिश के बाद उठती है। इंशा जी उर्दू के एक तरह से जोगी कवि हैं। उन्होंने स्वयं लिखा है-

'हम जंगल के जोगी हमको एक जगह आराम कहां...'  

शायरी को इंशा एक तरह से जोग मानते हैं। कबीर की तरह वह भी भाव में आध्यात्मिक हो जाते हैं। संसार से दूर हो जाते हैं। उसे अपनी कलामों के जरिए कसौटी पर कसते हैं। वह संसार की सभी चीजों में सौंदर्य देखते हैं। वह भिक्षा में भी सौंदर्य देखते हैं। एक तरह से संसार में जो कुछ भी सुंदर है उसे वह अपनी कविता में समेट लेना चाहते हैं। बिस्मिल्लाह के अनुसार इंशा को जोग-बिजोग, परदेसी, बिरहन, माया-भ्रम का काव्यबोध निजी अनुभवों से हुआ होगा। शायरी उसकी मूल वजह नहीं होगी। भूमिका में बिस्मिल्लाह कहते हैं कि इंशा बिंबों के चितेरे कवि हैं। अन्य कवियों की तरह चांद उनका भी प्रतीक है। हालांकि उनकी शायरी में सूक्ष्म प्रतिरोध अधिक है। सूक्ष्म इसलिए कि इंशा बड़े निराले अंदाज से खामोशी से जबान पैदा करते हैं। 

'गर्म आंसू और ठंडी आहें, मन में क्या क्या मौसम है
इस बगिया के भेद न खोलो, सैर करो खामोश रहो 
आंखें मूंद किनारे बैठो, मन के रक्खों बंद किवाड़
इंशा जी लो धागा लो और लब सी लो खामोश रहो' 


वैसे इब्ने इंशा के काव्य रूपकों का कितना भी विश्लेषण कर लो, वह अधूरा ही लगता है। उनकी शायरी के बारे में जो कुछ भी कहा गया हो वह कल्पित भी हो सकता है। अधूरा भी हो सकता है। इंशा अपनी शायरी में छिपे दर्द के बारे में कहते हैं-

'फर्ज करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो
फर्ज करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो'




 
1 week ago

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