'मैं आधी रात को अवार्ड अपने हाथ में लेकर सोचता कि एक दिन ये मुझे भी मिलेगा'

a part of Tarkash book: Javed Akhtar's nights at kamal studio
                                
जावेद अख्तर अपनी किताब तरकश में एक ‌ऐसा किस्सा ‌लिखते हैं जिसे पढ़कर लगता है कि मायानगरी की इस दुनिया में अपने लिए मुकाम बनाना वाकई कितना तल्‍ख सफर है। इस सफर को सहते जाता हर किसी के बस का नहीं होता। 

फ़िल्मों में अपना नाम बनाने की जद्दोजहद में लगे जावेद अख़्तर को एक दिन कमाल स्टूडियो में मीना कुमारी के तीन फ़िल्म फेयर अवार्ड रखे मिले। उन्होंने पहली बार किसी अवार्ड को छुआ था। वो इन अवार्ड को हाथ में लेकर ख़्वाबों की दुनिया में चले जाते और सोचते मुझे भी एक दिन अवार्ड मिलेगा। 

कमाल स्टूडियो में बिताई रातों के बारे में जावेद अख़्तर अपनी किताब 'तरकश' में बताते हैं कि "रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है। मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढ़ियों पर एक कमजोर से बल्ब की कमज़ोर सी रौशनी में बैठा हूं। पास ही जमीन पर इस आंधी-तूफ़ान से बेख़बर तीन आदमी सो रहे हैं। दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है। बारिश लगता है अब कभी नहीं रूकेगी। दूर तक खाली अंधेरी सड़कों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है। ख़ामोश बिल्डिंगों की रौशनियां कब की बुझ चुकी हैं। लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे। इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है। बम्बई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूं, जैसे कुछ भी नहीं हूं। आदमी कितनी भी हिम्मत रखे, कभी-कभी बहुत डर लगता है।

मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो ( जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूं। कम्पाउंड में कहीं भी सो जाता हूं। कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरिडोर में। यहां मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोज़गार इसी तरह रहते हैं। उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है। वो रोज़ एक नई तरकीब सोचता कि आज खाना कहां से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है। जगदीश ने बुरे हालात में जिंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है। 

मेरी जान पहचान अंधेरी स्टेशन के पास फ़ुटपाथ पर एक सेकेंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है। इसलिये किताबों की कोई कमी नहीं है। रात-रात भर कम्पाउंड में जहां भी थोड़ी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूं। दोस्त मज़ाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज़्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊंगा.....आजकल एक कमरे में सोने का मौका मिल गया है। स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ दीवारों से लगी बड़ी-बड़ी अल्मारियां हैं जिनमें फिल्म पाकीज़ा के दर्जनों कस्ट्यूम रखे हैं। 

फिल्म अवार्ड को हाथ से छूने के किस्से को  भी जावेद अख्तर बेहद खूबसूरत तरीके से लिखते हैं। जावेद साहेब लिखते हैं "मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं इसलिए इन दिनों फिल्म की शूटिंग बंद है। एक दिन मैं अल्मारी का खाना खोलता हूं, इसमें फिल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फि़ल्मफ़ेयर अवार्ड भी पड़े हैं। मैं उन्हें झाड़-पोंछकर अलग रख देता हूं। 

मैंने जिंदगी में पहली बार किसी फिल्म अवार्ड को छुआ है। रोज रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूं और सोचता हूं कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूंजते हुए हाल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराउंगा और कैसे हाथ हिलाऊंगा। इसके पहले कि इस बारे में कोई फ़ैसला कर सकूं स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफ़ाओं में रहेंगे (महाकाली अंधेरी से आगे एक इलाका है जहां अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है।"

उस ज़माने में वहां सिर्फ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाड़ियां जिनमें बौद्ध भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफ़ाएं थीं, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस गांजा पीनेवाले साधु पड़े रहते थे। महाकाली की गुफ़ाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की ज़रूरत ही नहीं, आपके तन पर सिर्फ़ बैठ जांए तो आंख खुल जाती है। एक ही रात में यह बात समझ में आ गई कि वहां चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता। तीन दिन जैसे-तैसे गुज़ारता हूं। बांद्रा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है। 

मैं बांद्रा जा रहा हूं। जगदीश कहता है दो एक रोज़ में वो भी कहीं चला जाएगा ( ये जगदीश से मेरी आखिरी मुलाकात थी)। आने वाले बरसों में ज़िंदगी मुझे कहां से कहां ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहां रहने वाले साधुओं और आसपास के झोपड़पट्टी वालों ने चंदा करके उसका क्रिया-कर्म कर दिया। क़िस्सा ख़त्म। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की ख़बर भी बाद में मिली। मैं अक्सर सोचता हूं कि मुझमें कौन से लाल टंके हैं और जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांद्रा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफ़ाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफाक़ लगता है। हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं।

(जावेद अख्तर की किताब तरकश का एक अंश)
3 years ago
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