चुपचाप बैठा था आसमान,
तारों की भीड़ में एक तन्हा तारा,
धरती की धड़कनों को सुनता रहा
बिना आवाज़ के।
हवा ने कुछ कहा नहीं,
पर उसके स्पर्श में एक कहानी थी,
कि जैसे वक़्त रुक गया हो
पत्तों की थकान में।
मैंने भी कुछ न कहा,
मन के कोने में रखी थी एक बात,
जो शायद कोई समझ न पाता,
या शायद मैं ही न समझ पाया।
पर उस रात,
जब चाँद ने न आँख झपकी,
और मेरी परछाईं ने खुद को थामा,
मैंने जाना —
चुप्पी भी एक भाषा है,
जिसमें आत्मा बोलती है।
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