मैं मुंतजिर हूं कि कब वस्ल-ए-शाम हो।
कभी तो लब तर हों,कभी तो जाम हो।।
मुद्दतों पुरानी चिट्ठी,करीने से लगायी हैं।
किसी तहरीर में शायद,नया पैग़ाम हो।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X