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बज़्म-ए-तरब ना सजाना, बेसबब नहीं।

                
                                                         
                            कलम वाकिफ है , उन्वान-ए-ग़ज़ल से।
                                                                 
                            
तुम क्यूं डर रहे हो, तूफ़ान-ए-ग़ज़ल से।।

अगर गौर से सुनोगे, तो समझ जाओगे।
मेरा दर्द जान लोगे, पैग़ाम-ए-ग़ज़ल से।।

बज़्म-ए-तरब ना सजाना, बेसबब नहीं।
मेरी सहर डर हुई है , शाम-ए-ग़ज़ल से।।

साकी अब हम तेरे दर पे आते ही नहीं।
ये प्यास बुझा लेते हैं जाम-ए-ग़ज़ल से।।

कौन सुने मेरी दास्तां , मशरूफ हैं सब।
लोग तो बचते हैं अब,नाम-ए-ग़ज़ल से।।

ये तन्हाई भी अब यूं तन्हाई नहीं रहती।
बिखरा है सन्नाटा, अंज़ाम-ए-ग़ज़ल से।।
-यूनुस खान
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4 घंटे पहले

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