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ये रौनकें, घर-आंगन की जिंदा हैं तुझसे।

                
                                                         
                            चाय के साथ, अखबार अच्छा लगता है।
                                                                 
                            
तेरा साथ है तो, इतवार अच्छा लगता है।।

ये रौनकें, घर-आंगन की जिंदा हैं तुझसे।
गर तू है, तो ये घर-द्वार अच्छा लगता है।।

ये ख़ामोशी-ओ-सन्नाटे खलते हैं मुझको।
गिले-गुस्से का इज़हार अच्छा लगता है।।

तन्हा कोई चीज हम खरीद नहीं सकते।
तेरे साथ जाना बाज़ार अच्छा लगता है।।
-यूनुस खान
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9 घंटे पहले

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