मैंने देखा है उसे किसी मंज़र का तमाशबीन बनते,
मैंने देखा है उसे अपनी ही सरगोशियों में लोगों से बहुत कुछ कहते।
जाते-जाते वह मुझसे यह बयाँ कर गया—
“मेरे जनाज़े पर तुम थोड़े-से फूल चढ़ा देना,
कुछ नहीं तो कम-से-कम दिखावे के ही दो आँसू बहा देना।
फिर तुम यह न समझ लेना कि मैं तुम्हें माफ़ कर जाऊँगा।
शिकायतें तो अब भी बहुत-सी हैं तुमसे,
मगर अब तुम्हें यह कैसे बयान करूँ कि...
ख़ामोश हो गया हूँ मैं आज।
हो सके तो बिना कहे ही
मेरा हाल-ए-दिल लोगों को समझा देना...”
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