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तेरे-मेरे इश्क़ का ख़ुमार कम न हो।

                
                                                         
                            मोहब्बतों का दौर
                                                                 
                            
मोहब्बतों का दौर कम न हो,
अपनी चाहतों का दौर कम न हो।
उम्र भर चले यह पाकीज़ा रिश्ता हमारा,
रूमानी मुलाक़ातों का दौर कम न हो।
तेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव मिलती रहे,
चाँदनी रातों का ख़ुमार कम न हो।
तेरे होंठों से छूकर जो निकले कभी,
उस मोहब्बत भरी बात का असर कम न हो।
तेरी साँसों की ख़ुशबू में खोया रहूँ,
इन महकती फ़िज़ाओं का दौर कम न हो।
तू क़रीब आए तो धड़कनें कह उठें,
जिस्म में रूह तक प्यार कम न हो।
तेरी उँगलियाँ जब मेरी उँगलियों में रहें,
उस नर्म लम्स का ख़ुमार कम न हो।
बारिशों में भीगते रहें तेरे साथ में,
भीगी रातों का सिलसिला कम न हो।
तेरी आँखों में जब चाँद उतर आए,
उस हसीं चाँदनी का निखार कम न हो।
एक चादर, दो साँसें, ख़ामोशियाँ,
इस ख़ामोशी में भी इज़हार कम न हो।
वक़्त थम जाए तेरी बाँहों में यूँ,
उस लम्हे का कभी असर कम न हो।
उम्र ढल जाए, मौसम बदलते रहें,
मेरे दिल में तेरा प्यार कम न हो।
जानाँ, मेरी आख़िरी साँस तक,
तेरे-मेरे इश्क़ का ख़ुमार कम न हो।

— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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