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मन का मंथन

Man ka manthan
                
                                                         
                            अपने ही मन का मंथन करके कभी जो देखें
                                                                 
                            
कोई यहाँ खलिस है कुछ तो यहाँ भरम है !

सौहार्द की तरंगे फैली हुई फिजा में 
कुछ आँधियों से बिखरे पत्ते गिरे जमीं पे

जो पतझड़ो से संभले वो ही यहां चमन है 
कोई यहां खलिस है ! कुछ तो यहां भरम है 

चारों तरफ उजाला फैला हुआ गगन है 
अंजान सा है रस्ता सूनी पड़ी डगर है !

पगडंडियों पे चलते मिलते भी हमसफर हैं
कोई यहाँ खलिस है कुछ तो यहाँ भरम है 

किसी और के दुखों से जो हम दुखी हो जायें
इंसानियत के रिश्ते को मन से जो निभाये

ये ही तो सच्ची मेहनत ये ही सही लगन है 
कोई यहां खलिस है ! कुछ तो यहां भरम है !

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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