अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
नींद आए तो अचानक तिरी आहट सुन लूँ
जाग उठ्ठूँ तो बदन से तिरी ख़ुश्बू आए
- शहज़ाद अहमद
कोई दस्तक कोई आहट न सदा है कोई
दूर तक रूह में फैला हुआ सन्नाटा है
- वसीम मलिक
हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर'
उदासी बाल खोले सो रही है
- नासिर काज़मी
रोने लगता हूँ मोहब्बत में तो कहता है कोई
क्या तिरे अश्कों से ये जंगल हरा हो जाएगा
- अहमद मुश्ताक़
अब तो कुछ भी याद नहीं है
हम ने तुम को चाहा होगा
- मज़हर इमाम
अब किसी तरह दिल नहीं लगता
घर में सब कुछ तो है सिवा घर के
- पूजा भाटिया
Urdu Poetry: अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करो