आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Rakesh Dhar Dwivedi Poetry: देखा था जो तुझको छिप कर

कविता
                
                                                         
                            देखा था जो तुझको 
                                                                 
                            
छिप कर कभी-कभी,
वो पल सता रहे हैं 
मुझको अभी-अभी।

वो झील के किनारे 
वो मस्त-मस्त नजारे 
वो चांदनी रातें 
हाथों में हाथ थामे 
वो मीठी-मीठी बातें 
वो यादों के लश्कर 
मुझको बुला रहे हैं।

इन तनहाइयों और इन रातों में 
इन रोते हुए जज़्बातों में 
वो फिज़ा और वो नज़ारे 
मुझको बुला रहे हैं।

कैसे बताऊं तुम बिन 
कैसे जीवन बिता रहे हैं,
देखा था जो तुझको 
छिप कर कभी-कभी,
वो पल  सता रहे हैं 
मुझको अभी अभी।  

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o  

37 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर