मुरली भी हुंकार भी
मथुरा की कारा में जन्मे,
गोकुल में मुसकाए।
नन्हे हाथों माखन चुराया,
कंस मिटाने आए।
बाल रूप में प्रेम लुटाया,
दीनों का उद्धार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
गैया संग वन-वन में चलते,
मीठी तान सुनाए।
कालिय के फन पर वे नाचे,
उँगली पर गिरि उठाए।
कोमल तन में शक्ति अनोखी,
भक्तों का आधार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
राधा के निश्छल प्रेम से,
जग को प्रेम सिखाया।
रास रचा तो हर गोपी ने,
कान्हा पास ही पाया।
प्रेम नहीं तन का बंधन है,
मन से मन का तार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
मुट्ठी भर चावल को कान्हा,
प्रेम समझ अपनाए।
दीन सुदामा द्वार जो आए,
हृदय लगा मुसकाए।
द्रौपदी ने टेर लगाई,
दौड़े पालनहार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
गोकुल में ग्वाले बन डोले,
द्वारकाधीश कहलाए।
मोर-मुकुट संग राज सँभाला,
धर्म के दीप जलाए।
सिंहासन पर रहकर भी वे,
सबके सच्चे यार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
माखनचोर बने ब्रज में तो,
रणछोड़ भी कहलाए।
पीछे हटकर धर्म बचाया,
नीति का मर्म बताए।
कब झुकना, कब अडिग रहना,
समय बड़ा हथियार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
शांति-दूत बन कौरव घर में,
संधि का दीप जलाया।
युद्ध हुआ तो रथ पर बैठकर,
गीता-ज्ञान सुनाया।
शस्त्र बिना भी साथ खड़े थे,
बनकर विजय-आधार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
सौ अपराध क्षमा कर कान्हा,
धीरज-धर्म निभाए।
मर्यादा की सीमा टूटी,
चक्र सुदर्शन चलाए।
क्षमा-दया के संग ज़रूरी,
नीति और अधिकार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
वृंदावन में प्रेम लुटाया,
कुरुक्षेत्र में ज्ञान सुनाया।
अर्जुन का जब मन डगमगाया,
मित्र बनाकर धीर बँधाया।
जीवन चाहे युद्ध बने पर,
कर्म बने पतवार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
जब भी मन में संशय जागे,
कान्हा याद में आए।
मन की मुरली प्रेम जगाए,
गीता राह दिखाए।
प्रेम रहे, पर धर्म बचाने,
साहस हो तैयार।
मुरली से मन हरते कान्हा,
चक्र उठे तो जय-जयकार॥
— संतोष कुमार शर्मा
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