आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मन घर में ही छूट गया

                
                                                         
                            सूटकेस में कपड़े थे,
                                                                 
                            
आँखों में अरमान।
माँ ने हँसकर विदा किया,
भीगा था दालान।
जहाज़ उठा जब नभ में,
पीछे छूटा शहर।
खिड़की से सब छोटा था,
बढ़ता गया सफ़र।
नई सुबह तो मिल गई,
कुछ अपना पीछे रह गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

एडिलेड की साफ़ सड़कें,
चारों ओर मकान।
कमरे में सब सुविधा थी,
कौन करे पहचान।
नई घड़ी, नया मौसम,
नया लगा संसार।
घर की चौखट याद आई,
कौन करे अब प्यार।
रात हुई तो सन्नाटा,
तकिए तक आ गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

रोटी कभी अधपकी थी,
दाल कभी बे-स्वाद।
माँ के हाथों का खाना,
आया बेहद याद।
कपड़े, बर्तन, कमरा भी,
हर दिन नया सवाल।
घर की छोटी सुविधाएँ,
अब लगतीं बेमिसाल।
अपना घर जब याद आया,
एक आँसू बह गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

बुखार आया रात में,
कौन रखे सिर हाथ।
दवा स्वयं ही लेनी थी,
कौन जगे फिर साथ।
माँ की आवाज़ फ़ोन पर,
ढाढ़स देती हर बार।
लेकिन खाली कमरे में,
कौन बने रखवार।
अपना ध्यान स्वयं रखकर,
बच्चा बड़ा हो गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

सुबह किताबें साथ लिए,
कॉलेज रोज़ जाना।
शाम किसी छोटे काम से,
अपना खर्च चलाना।
कभी रसोई, कभी दुकान,
जो भी मिला स्वीकार।
थका हुआ जब लौटता,
कमरा करे इंतज़ार।
घर में पलने वाला लड़का,
मेहनत करना सीख गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

दीवाली के दीप जले,
घर-घर हुआ उजास।
मेरे छोटे कमरे में,
यादें बैठीं पास।
सबके हँसते चेहरे थे,
फ़ोन के उस पार।
बात रुकी तो कमरे में,
छा गया अँधियार।
पूजा की घंटी सुनते ही,
बचपन लौट के आ गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

होली आई रंग लिए,
सूना रहा मकान।
न कोई रंग लगाने वाला,
न कोई पकवान।
राखी पर सूनी कलाई,
पूछे बहना कहाँ।
हर उत्सव में मन खोजे,
घर का वही जहाँ।
भीड़ भरी थी चारों ओर,
मन फिर भी अकेला रह गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

रोटी पर घी रखकर माँ,
देती थी हर बार।
यहाँ बना कर खाता हूँ,
फिर भी कहाँ वह प्यार।
डिब्बे में माँ का अचार,
जैसे माँ का साथ।
एक कौर खाते ही फिर,
याद आई हर बात।
स्वाद मिला तो आँख से,
इक मोती फिर ढल गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

पापा चुप-से रहते थे,
आँखों में विश्वास।
कंधे पर रख हाथ कहा,
करना सपना खास।
उनकी डाँट में छिपा हुआ,
चिंता का संसार।
अब समझा उस मौन में,
पापा का दुलार।
उनकी एक सलाह से ही,
हर संकट भी टल गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

भाई संग हर छोटी बात,
बन जाती तकरार।
पाँच मिनट में फिर दोनों,
हो जाते थे यार।
उसकी चीज़ें छेड़कर,
फिर हँसते छिप जाना।
अब वह पास नहीं तो फिर,
किससे रूठूँ, किसे मनाना।
जिस शोर से मैं भागता था,
वही शोर याद आ गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

मेहनत की कीमत मिली,
काम मिला सम्मान।
अपने पैरों पर खड़ा,
बढ़ा स्वयं का मान।
साफ़ हवा, सुरक्षित राहें,
जीवन में विस्तार।
नए अवसर ने दिया,
सपनों को आकार।
खुद को ढूँढ़ने निकला था,
एक नया मैं मिल गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

पहली तनख़्वाह जब मिली,
आँखों में था नूर।
माँ बोली, खुश रह बेटा,
पापा को था गुरूर।
नौकरी ने दे दिया,
जीने का सम्मान।
फिर भी घर से बढ़कर कब,
होता कोई जहान।
जीत मिली तो दर्द भी,
मन में साथ ठहर गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥

दूरी ने समझा दिया,
घर क्यों है अनमोल।
रिश्ते ही दे पाते हैं,
मीठे सच्चे बोल।
लौटूँगा तो आँगन में,
फिर बचपन खिल जाएगा।
भाई मुझसे झगड़ेगा,
घर फिर घर बन जाएगा।
दूर गया हूँ घर से पर,
घर मुझसे कब दूर गया।
सपनों ने परदेस बुलाया,
मन घर में ही छूट गया॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर