आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ताजमहल की सैर

                
                                                         
                            आगरा पूरे जगत के नक्शे में छाया
                                                                 
                            
जहां हर तरफ फैला है ताज का जादुई साया
एक अवसर ,यादों का सैलाब लाया
अरसे पहले मेरा ताजगंज में रूकना
घर की छत से ताजमहल का दीदार करना
पूर्णिमा की चांदनी रात ,उस पर ताजमहल की सफेदी
छत पर बहती शीतल हवा और सूखती यमुना नदी
एक शाम चल पड़े कदम ताजमहल की ओर यूंही बस
पैदल टहलते पहुंच गये,तब कोई टिकट नहीं था, जब चाहे चल पड़ो जसतस
देखा नजारा दो संगमरमरी कब्र करीब करीब जमीं हुई
रश्क आया उनके आपसी बेपनाह मुहब्बत पर और मै आहत हुई
कोई इतना प्यार आपस में कैसे कर लेता है
एक नायाब तौफा जेहन में कैसे गढ़ लेता है
लोभान की खुशबु नथुने में फैलने लगी
आस पास बिखरे सूखे फूलों की महक छाने लगी
लेकिन लटकते कुछ जाले और चमगादड़ आहें भरते नजर आये
कैमरा लटकाये युवक ठिठौली पर उतर आये
गुम्बदों पर टिके मधुमक्खी के छत्ते और गुनगुन डराने लगे
और मेरे मजबूर कदम अब वापस लौटने को कहने लगे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर