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"दीवाली अबकी बार"

                
                                                         
                            "दीवाली अबकी बार"
                                                                 
                            

इस दीवाली
बेच दी,
हाँ बेच दीं सब की सब आहें मैंने,
कुछ दर्द भी,
कुछ फटे-पुराने रिश्ते,
सारी की सारी फरमाइशें,
अपनो से जो थीं वो शिकायतें,
कुछ बन्दिशें,
कुछ तन्हाइयाँ ,
कुछ फासले,
सारी यादें,
और भी बहुत कुछ...
दाम भी मिले,
और दर्द से छुटकारा भी...
सोचती हूँ ..
क्यूँ ना ज़माने की तमाम शिकायतें,
फरमाहिशें,
दर्द,
परेशानियाँ भी बिकवा ना दूँ
किसी को
जो सारा बोझ हल्का कर जाए ..
कांधों का
मन का
दिमाग का
रिश्तों का
कुछ बेबाक सपनों का,और
मेरे कुछ अपनों का..
बड़ी खुशनुमा सी लग रही अब
ये दिवाली ...
जगमगाते दियों सी रोशन,
अब तक़ ये ज़िन्दगी ...
अनगिनत..
अनकहे ..
अनछुये ..
पहलुओं को समेटती
थक सी चुकी थी....
अब,
बड़ी शांत सी है ये पगली
ठहरी नदी की तरह,
नयी नवेली कोपलों सी ...
भूकंप सी हलचलें भी
अब शांत सी हैं..
पतझड़ मुस्कुरा रहा है..
मन की उदासी...
अब खिलखिला रही,
मन बेहद हल्का है अब..
हल्का बहुत हल्का,
इस दीवाली.....

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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