गो शहर-भर आवारगी बर्पा हुई,
संसद में लेकिन शून्य-भर चर्चा हुई।
लोग कहते हैं कि कल जिंदा थी पर,
है आजकल इंसानियत मुर्दा हुई ।
शायरी के मायने कुछ हों न हों,
शायरी पर हर समय फतवा हुई ।
बेईमानी का असर कुछ यूँ बढ़ा,
ईमानदारी खुद ही बा-पर्दा हुई ।
मौत बेशक मूल भी है ब्याज भी,
जिंदगी पर 'तेज' बस खर्चा हुई।
- तेजपाल सिंह 'तेज'
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