आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल : गो शहर-भर आवारगी

                
                                                         
                            गो शहर-भर आवारगी बर्पा हुई,
                                                                 
                            
संसद में लेकिन शून्य-भर चर्चा हुई।

लोग कहते हैं कि कल जिंदा थी पर,
है आजकल इंसानियत मुर्दा हुई ।

शायरी के मायने कुछ हों न हों,
शायरी पर हर समय फतवा हुई ।

बेईमानी का असर कुछ यूँ बढ़ा,
ईमानदारी खुद ही बा-पर्दा हुई ।

मौत बेशक मूल भी है ब्याज भी,
जिंदगी पर 'तेज' बस खर्चा हुई।

- तेजपाल सिंह 'तेज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर