आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

न गोद है सिरहाने , न ही प्यार का आँगन !

                
                                                         
                            ना लोरियां , बाँहों का झूला , सो रहा बचपन !
                                                                 
                            
न गोद है सिरहाने , न ही प्यार का आँगन !

ईटों पे सर रख , भूख ओढ़ , सो रहा बच्चा ,
ये है नहीं कोई कथा , ये देश का दर्पण !

सपनों में भी मासूम, माँ को खोजता होगा ,
हम क्यों न हों विचलित,गिरे क्यूँ न अश्रु कण!

धरती पे ही जब है नहीं ,सुकून ओं मंगल ,
हम ढ़ूंढ़ते हैं क्यूँ भला , मंगल में जा जीवन ?
- तनु थदानी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
50 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर