ज़िंदगी का हाल
ज़िंदगी का अज़ब
हाल देखा,
जिस की भी मदद की,
वक्त पड़ने पर
उसी का ठेंगा देखा।
कोई सखा-सहयोगी
कोई रिश्ता- नाता
बन आया,
बाद में वक्त निकलने पर,
उसी ने पीठ में खंज़र भौंका।
कुछ बड़े- बजुर्ग
और तो और
श्रद्धेय ऑ आदरणीय
सबको अपनी अपनी
डफली औ अपना ही राग
अलपते देखा।
मुहब्बत हो या के इबादत,
बुलंदी या के शोहरत,
सभी को चाँदी की
खनक पर,
बेसाख्ता,बेबाक,
कनीज़ की मानिंद,
झुक,
कॉर्निश कर करते
हुक्म बजाते देखा।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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