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व्यंग्य - आलोचना

                
                                                         
                            व्यंग्य - आलोचना
                                                                 
                            

जीवन के समग्र पर,
उसके समर पर,
विसंगतियाँ के समुद्र पर,
फैली कितनी-कितनी
विद्रूपताएं।
साहित्य- संस्कृति के
सोपानों में,
कितनी-कितनी
विधाएँ।
इन्हीं के संधान में
या फिर अनुसंधान में
लो फिर बात आई
कौन करे व्यंग्य की
आलोचना की!?
व्यंग्य के संधान की
या के आलोचना के
लोचन की।
व्यंग्य तो है ही
आलोचना!
जब-तब,
यहाँ -वहाँ
निज़ाम ऑ सियासत
को दिखाती आईना।
व्यंग्य भी तभी तक
है आईना,
जब तलक दिल में
है,
औ फिर कलम में
आम जन के अलम
को मिटाने ऑ
बताने की कामना।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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4 घंटे पहले

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