लड़ मरने का जज्बा तो मैदान में लड़ो।
ट्रोल की आग को इस तरह हवा न दो।
धर्म नष्ट सदियों की दासता न कर पाई।
ट्रोल ये सारे गिनती के दिनों में कर गए।
धरती निगल गयी या आसमां खा गया।
सुना करते है एक हुआ करती थी नूपुर।
धर्मगुरु के अपमान का फतवा है भारी।
क्या तुम्हारा ट्रोल उसे बचाने रहा खड़ा।
क्या ट्रोल बताएगा धर्म को खतरा हुआ।
अफ़सोस होता है देख इस नादानी को।
राह भूल पड़े धर्म मानते न शास्त्र पढ़ते।
बच्चों की बन्दर सैना आगे कर निकले।
किस मुंह से भेजेंगे बेटियां पढ़ने खेलने।
जिन्हें नोचने जो दंरिदे तुमने किये खड़े।
मत जागो अब भी तालियां बजाते रहो।
करतूतों का मातम सजा बैठे घर घर मे।
माफ़ करो आज कहने से न रुक सका।
बात धर्म की धर्म उन्हें क्या सीखा सका।
दम भरते हो शहीद होने निकले धर्म पर।
क्या जान रहे थे किस फौज में हुए खड़े।
-सुरेश गुप्ता
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