क्या हो अगर
अपनी सतह पर तैरते फूलों
से पानी कोई सवाल नहीं पूछे
उन्हें तो हो बस
मन माफिक पानी में तैरने की आज़ादी
क्या हो अगर
पानी फूलों से नहीं पूछे उनकी डाली से
विलग होने की दास्तां
और आराइश के लिए
ड्राइंग रूम तक उनका सफर,
पानी की सतह पर तैरते फूल
फूल नहीं
आसमान से टूटकर
जमीन पर बिखर गये सितारे हैं
बिछोह और टूटन में श्वास लेते
जमीन को गीला करते,
उदास अस्तित्वों जैसे फूलों के अश्रुओं ने
पानी की शर्करा को खारा कर दिया है
पानी में तैरते फूल
जीवन के सिरे को पकड़कर
कहीं पानी की गहन तलछट में बैठ जाना चाहते हैं
जहां कोई नहीं परखेगा सतह पर उनके
गुमगश्ता अस्तित्व को
उनके अश्रुओं से
पानी के लावण्यमय हो जाने को
पानी और फूल
समझने लगे हैं एक-दूसरे को
प्रगाढ़ रिश्ता बन रहा है उनमें
कुछ अजीब सा
सुगंध और पारदर्शिता का
मिठास और खारेपन का
अजीब सा रिश्ता अद्भुत होता है
अलग सा जो होता है
-सुनीता भट्ट पैन्यूली
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