गुजरते वक़्त के साथ सब बेगाना लगता है,
जो कल की बात थी, वो भी अफ़साना लगता है।
वादा किया था ख़ुद से कि आँखें नम न होंगी,
मगर हर मोड़ पर यह वादा टूटने लगता है।
चाह थी जिस मंज़िल की, पहुँच न सके वहाँ,
अब रास्ते तो खुले हैं, पर दिल ही नहीं करता है।
साथी हो साथ तो काँटों का सफ़र भी लगे सुहाना,
वर्ना तो ऐश-ओ-आराम भी चुभने लगता है।
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