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मुँडेर

                
                                                         
                            बचपन से अबतक छत की 
                                                                 
                            
वह मुंडेर मुझे याद आती है
मुंडेर मेरी छत की है या 
तेरी यादों के साये की है 
आज तक मे मैं समझ ना पाया 
मुंडेर से कभी तुम्हें कभी क्यारीयों में पानी देते
पंछियों को दाना डालते 
बकरी के बच्चे को दुलारते
सूप में गेहूँ फटकारते
आंगन को लीपते 
गोबर के कंडे थापते
सूर्य को अर्ध्य देते 
गीतों को गुनगुनाते
चुपचाप मैं देखा करता था 
तब लगता था मानो 
सब कुछ पा लिया हो
गाँव से पलायन के बाद
शहर की ऊंची इमारतों के बीच
जैसे मेरी छत की मुंडेर
कही खो सी गई है
मैं इस शहर मे अजनबियों के बीच 
तुम्हारी यादों का पन्ना जो कभी मुंडेर पर 
अपने मन के पृष्ठ पर लिखा था
आज तक भुला नहीं पाया हूँ
काश!बचपन से जवानी की वो मुंडेर 
फिर से अपने आंगन में दोहराओ 
मैं अपनी मुंडेर से वही मंजर को 
पुन: महसूस कर सकूं

निहाल चन्द्र शिवहरे , झॉंसी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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