आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक मौसम उसके इंतज़ार का

                
                                                         
                            “गुज़र गए कई मौसम,
                                                                 
                            
मगर एक मौसम अब भी ठहरा है—
उसके इंतज़ार का...”

पतझड़ जानता है विरह की वेदना,
शायद तभी तो
वह भी वसंत के आने का इंतज़ार करता है।

धूप आती है,
कुछ पल ठहरती है,
फिर पूछकर चली जाती है—
“आया नहीं उसका कोई पैग़ाम?”

आँखें रास्तों पर टिक-टिककर
इंतज़ार करते-करते थक गईं,
मगर दिल है कि
उम्मीद का दामन अब भी नहीं छोड़ता।

मौसम एक-एक कर गुजरते जाते हैं,
और हर मौसम
अपनी एक नई रागिनी सुना जाता है...
पर वक़्त है कि
उसके इंतज़ार में
जैसे ठहर-सा गया है।

सावन भी आ गया...
बादलों ने आसमान को घेर लिया,
बारिश की बूँदों ने
धरती को छूकर जैसे आवाज़ लगाई,
मोर और पपीहे ने भी
उसके आने की पुकार लगाई...
और तभी
बिजली की एक चमक में
उसका साया-सा दिखाई दिया—
पल भर को लगा,
शायद वह लौट आया...
मगर अगले ही पल
वह साया भी ओझल हो गया।

ये कैसी कशमकश है?
कैसी बेबसी है?
जिसका कोई नाम नहीं...

शायद
मोहब्बत की यही रुत है—
जहाँ हर मौसम बदल जाता है,
हर शाम ढल जाती है,
हर सावन बरस जाता है...
बस नहीं बदलता तो
उसके लौट आने का इंतज़ार।

शायद इसी को कहते हैं—
एक मौसम उसके इंतज़ार का...
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर