कुछ मैं कहता हूँ,कुछ सुनकर जाओ !
ये मस्जिद की मीनार,
ये मंदिर का कलश,
ये सब चार दीवारी पर
ही चार चांद लगाते हैं,
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
ये भगवा ये फतवा,
ये केशरिया ये हरा,
ये रंग में बदल गया
मगर तुम नहीं बदल पाए अपने आप को
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
ये शस्त्र ये शास्त्र,
ये बम ये बंदूकें,
ये सब छोड़ कर तुम
हाथों में चार-चार चूड़ियां
पहन लो धर्मभ्रष्ट
ये आका ये भगवान,
अचरज में पड़ गया है अब
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
ये मौलवी ये पंडित,
ये टोपी ये टिका,
इनका घड़ा फोड़कर
अमन की आस्था में चलो
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
ये क़ुरआन ये गीता,
ये आयत ये श्लोक,
ग्रन्थों को छोड़कर कभी
प्रथम प्रष्ठ पर ध्यान से पढ़ा होता
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
ये नक़ाब ये घूंघट,
ये खतना ये जनेऊ,
सब अंधविश्वासी कार्य है
कुछ कहता हूँ, कुछ सुनकर जाओ।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X