हे मदिरा के प्रेमी तुम तो
तुम मधुशाला मत जाओ
नन्हे मुन्ने बच्चों को तुम
पाठशाला पहुचाओ
जिस मदिरा के प्रेमी तुम हो
उस मदिरा से कुछ लाभ नहीं
तन भी मिटता धन भी मिटता
मिटती निजी कमाई है
बीमारी से मृत्यु मिलेगी
दुख में नहीं सगा भाई है
दिन भर मेहनत मजदूरी कर
चुटकी भर पैसा पाते हो
जान बूझकर मधुशाला से
घर क्यों बीमारी लाते हो
हाथ जोड़कर करूं निवेदन
न तुम मदिरा पान करो
बच्चों को अच्छी शिक्षा दो
जग में अपना नाम करो
-शिवप्रकाश सोनकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X