आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कायल जिसकी दुनिया सारी

                
                                                         
                            न छुआ,
                                                                 
                            
न उसने बॉडी टच की,
न उसने ललकारा।
अपने ही सुकर्मों से उसने,
फिरंगियों तक को दुत्कारा।
अहिंसा का पाठ पढ़ा कर
उसने हिंसा को ही मारा।
मातृ-भूमि के गौरव खातिर,
अपना जीवन ही वारा।
कर्मठ बन कर्मठता सिखलाया,
सरल बन सरलता।
स्वच्छभाव से उसने सिखलाया,
हम सबको निर्मलता।
राम नाम में रम कर उसने,
की कल्पना रामराज की।
तोड़ बेड़ियाँ गुलामी की,
की कल्पना स्वतंत्रराज की।
कायल जिसकी दुनिया सारी,
क्यों न गुण को जापू?
कोई नहीं बस एक ही हैं वो,
राष्ट्रपिता हमारे बापू।
- पवन कुमार साव "शत्यागाशी"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर