जय नीलाचल-नायक, जगत्पते दयामय।
करुणासिन्धो! पालय मां, भवभय-हर सुखमय॥
बलभद्र-सुभद्रा सहित, भक्त-विहार-विभो।
नन्दीघोष-समारूढ़, मंगलमूर्ति प्रभो॥
दीन-दयाल, अनाथ-नाथ, जग-पालक भगवान।
रथ पर उतर जन-जन में, बाँटो प्रेम-विधान॥
महाप्रसाद-समत्व के, तुम अमर उद्घोष।
सेवा, प्रेम, समरसता, तुमसे पाते संतोष॥
छेरा-पहंरा की विभा, विनय-व्रत का मान।
सेवा से ही सिद्ध हो, जीवन का सम्मान॥
अंतर-रथ के सारथि, दो सद्बुद्धि-प्रकाश।
मिटे अहं, जागे करुणा, प्रेम बने विश्वास॥
चरण-रज का एक कण, हो जीवन का धाम।
युग-युग वंदित विश्वपति, अमर रहे तव नाम॥
शत-शत वंदन जगन्नाथ! कोटि-कोटि प्रणाम।
भव-सागर से तार दो, हे जगन्नाथ! सुखधाम॥
— श्री सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X