मृत्यु जहाँ जीवन बन बैठी, जीवन मृत्यु पुकारे है,
बुझा हुआ दीपक ही भीतर, नूतन सूरज धारे है।
जिसको जग अंत समझता है, वही आरंभ हमारा है,
मुट्ठी भर मिट्टी के भीतर, अनंत गगन पसारा है।
श्वास रुकी तो मौन ने बोला, जीवन तब मुस्काया है,
मृत्यु-द्वार पर खड़ा पथिक ही, अमरत्व-पथ पर आया है।
फूल मरा तो गंध बची, गंध में वन मुस्काता है,
देह गिरी तो चेतन नभ में, कौन नवाकार पाता है?
नदी मरी सागर में जाकर, सागर बनकर बहती है,
बूँद मिटी तो मेघ बनी, फिर धरती पर रहती है।
जीवन मृत्यु की छाया निकली, मृत्यु जीवन की काया है,
दोनों के इस मौन मिलन में, किसने किसको पाया है?
जो मरने से डरता रहा, वह जीकर भी कब जी पाया,
जिसने अपना ‘मैं’ ही खोया, उसने अमरत्व-दीप जलाया।
मृत्यु नहीं कोई अंतिम रेखा, जीवन उसका द्वार है,
जिस पार अँधेरा दिखता है, उस पार प्रभा अपार है।
जीवन यदि बहता प्रश्न हुआ, मृत्यु मौन उत्तर है,
दोनों जहाँ विलीन हुए, वहीं आत्मा का स्वर है।
जिसे मृत्यु हम कहते हैं, वह जीवन की करवट है,
जिसे जीवन हम कहते हैं, वह मृत्यु की आहट है।
अंत जहाँ से दिखता है, वहीं अनंत का उद्गम है,
मृत्यु जहाँ मुस्काती है, जीवन वहीं परम है।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X