मुझे इंसान नहीं, तुम्हारी रूह से मिलना है,
तुम्हारे चेहरे से नहीं, तुम्हारे एहसासों में उतरना है।
मुझे तुमसे नहीं, तुम्हारी फ़ितरत से प्यार करना है,
तुम्हारे हर सच, हर ख़ामोशी को अपना मानना है।
मुझे बस तुम्हारा नहीं, तुममें होकर रहना है,
जैसे दुआ किसी इबादत में खोकर जीती है।
मुझे मकान नहीं बदलने, मुझे तुम्हारे संग एक घर बनाना है,
जहाँ प्रेम की नींव हो और विश्वास का आशियाना हो।
और तुम...
शायद उस घर को देखते हो,
जो मैंने अपनी उम्मीदों से सजाया है,
जहाँ हर कोने में तुम्हारा नाम,
और हर साँस में तुम्हारा एहसास समाया है।
मैं तुम्हारे साथ एक रिश्ता नहीं,
एक संसार बुनना चाहती हूँ,
जहाँ मैं सिर्फ़ तुम्हारे पास नहीं,
तुम्हारी रूह में अपना घर पाना चाहती हूँ।
क्योंकि मुझे मोहब्बत निभानी नहीं,
उसे जीना है—
तुम्हारे साथ, तुम्हारे भीतर,
हर जन्म की तरह, हर दुआ की तरह।
— शांभवी श्रीवास्तव
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