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ख्वाबों का टूटना

                
                                                         
                            मेरे हाथों से ख़्वाब यूँ फिसलने लगे,
                                                                 
                            
जैसे मुट्ठी से रेत के ज़र्रे निकलने लगे।

एक घर बनाने की ख़्वाहिश थी उम्र भर हमें,
हम जोड़ते रहे पैसे, अरमान पिघलने लगे।

जिन रास्तों पर कभी मंज़िल नज़र आती थी,
वक़्त बदला तो वही रास्ते बदलने लगे।

जिनको अपना समझकर हर दर्द बताया था,
वही लोग हमारी मजबूरियाँ गिनने लगे।

हमने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा फिर भी,
क्यों हमारे ही सितारे हमसे जलने लगे।

बच्चों की ख़ुशी के लिए ख़ुद को भुला दिया,
हम हँसते रहे और आँसू निकलने लगे।

कभी आँखों में चमक थी नए ख़्वाबों की,
अब तो ख़्वाब भी आँखों में चुभने लगे।

किससे कहते कि हमारे भी कुछ अरमान थे,
लोग सुनते रहे और फ़ैसले सुनाने लगे।

ज़िंदगी तुझसे कोई शिकायत नहीं है,
बस कुछ अपने ही चेहरे बदलने लगे।

‘समीर प्यासा’ अब अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढालता है,
जो ज़ख़्म छुपाए थे, वो शेर बनने लगे
 
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2 घंटे पहले

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