पहुँचा दिया है जिंदगी ने उस मक़ाम पे,
वहशत सी होती है चाहत के नाम से।
गलियों से उनकी गुज़रते हैं तो मगरूर होते हैं,
धोखा देकर नवाजते हैं, जफ़ा के इल्ज़ाम से।
मैं भटकता हूं उसके लिए दर-बदर,
वो सोते हैं घरों में आराम से।
वो देखकर हमें फेर लेते हैं नज़रे,
हालत है उनकी यही कल शाम से।
दिल के ज़ख्म हैं कि भरते ही नहीं,
ना महफ़िल में लगता दिल ना चैन जाम से।
ना दिल ही रहा, ना चाहतों की दुनिया,
हुए हैं बर्बाद हम उनके इंतकाम से।
हम हुए हैं रुस्वा ज़माने की नज़रों में,
निकली जब कलम ए शमशीर नियाम से।
मुहब्बत का ज़िक्र ना छेड़ अश्क़
हुए हैं वो सब क़िस्से तमाम से।
- अश्क़ फ़तेहपुरी
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