आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम्हें जब देखकर

                
                                                         
                            तुम्हें जब देखकर पलकें झपकना भूल जाता हूँ।
                                                                 
                            
बिना लब खोले तासीर-ए-मोहब्बत आजमाता हूँ।

तुम्हारे आसमाँ में है मेरी मौजूदगी इतनी,
नज़र आऊँ न आऊँ, रात-दिन मैं टिमटिमाता हूँ।

घटाओं के बरसने पर पहाड़ों के कुहासों सा,
तुम्हारे पास आ कर प्यार की रंगत बढ़ाता हूँ।

तुम्हारी याद की खुशबू से जान-ओ-दिल मुअत्तर है,
कहीं बाहर नहीं, अपने ही अंदर तुम को पाता हूँ।

दिल-ओ-जाँ से यकीनन तुम मकां को घर बनाती हो,
मैं अपनी कोशिशों से जिन्दगी आसां बनाता हूँ।
- सतीश बोरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर