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अब इन गहराइयों से खुद को, निकालूँ कैसे मैं।।

                
                                                         
                            दिन के उजाले में उड़ने वाली, रात के अंधेरे में खो जाती हूँ मैं।
                                                                 
                            
दिन को काफिले साथ चलते हैं, रात को तन्हा हो जाती हूँ मैं।।

दुनिया भर की भाग-दौड़ से जब थक जाती हूँ,
फिर किसी से बात करने की, तमन्ना करती हूँ मैं।।

आसमां के उन सितारों को हजारों बातें कहती हूँ मगर,
वो पलट कर जवाब दे, ये भी चाहती हूँ मैं।।

मेरे कमरे की दीवारों की रग-रग से वाकिफ हूँ,
कोई इस तरह मुझे भी जाने, ये चाहती हूँ मैं।।

ख्वाबों की दुनिया माना, हसीन तो है मगर...
हकीकत की दुनिया भी वैसी चाहती हूँ मैं।।

जिसकी तमन्ना है, अगर वो ही न मिले तो!
सारी दुनिया पाकर भी, इसका क्या करूँ मैं।।

मेरे दिल की गहराइयों तक तुम पहुँच नहीं सकते,
अब इन गहराइयों से खुद को, निकालूँ कैसे मैं।।
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2 घंटे पहले

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