स्वीकार हो या अस्वीकार,
प्यार हो या नफरत,
जुदाई हो या सामीप्य,
समझौता हो या मजबूरी,
ये वाक्या आम है,
इसलिए फर्क नहीं पड़ता है,
ज़िंदगी जीने की आरजू वही है,
कुछ करने की जज्बा वही है,
उपरवाले का तहे दिल से आभार,
जिन्होंने जीवन जीने की मोहलत दी है !!!
- संजय श्रीवास्तव
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