इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा मानव
इंसान बन रहा है इंसानियत का दानव
जो समझे खुद को दुनिया का सिंकदर
कूदता है हर ओर वही बनके बंदर
हर बाग पर वह चाहे अपना अधिकार
वही काम का है बाकी सब हैं बेकार
एक सनक गया है बाकी बनो समझदार
उस लालची को सकते तो हो ललकार
क्यों छीने कोई किसी का अधिकार
दुष्परिणाम ही निकालता है अनाचार
पहले ही दुनिया को झोंका है आग में
पुनः जा रहा है वह उसी राग मे
संकोच मत करो सारे मिलकर रोको
दुनिया को फिर से मौत में मत झोंको
-कुँवर संदीप सिंह
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