तेरे ज़ख्मो की मंडी में ये दिल आबाद रहता है।।
पुराने घाव भर जाए पर संगदिल याद रहता है।।
कहाँ मंसूब होते हैं अँधेरों में लिखें हुए अशआर,,
कोई पढ़ना भी चाहे तो बुजदिल साथ रहता है।।
जलाएं क्या दिवाली पे सभी तो जल रहे हरसूं,,
दियो की रोशनी में चाँद हर दिल शाद रहता है।।
कहे क्या ख़ुदा के वास्ते कुछ तू ही सुना दे अब,,
क्या जाने कब घड़ी आए के दिल हाथ रहता है।।
भरी महफ़िल में ख़ुद को बचाना लाज़मी लेकिन,,
हमेशा तिरछी निगाहों से ये दिल बर्बाद रहता है।।
सभी क़ातिल हैं अपने यां सभी के हाथ खंज़र है,,
मगर उड़ने को हर पल ये दिल आज़ाद रहता है।।
उदू को अपने दिल का कभी रस्ता ना देना देव,,
यहाँ कोई भी नहीं अपना राफ़िल साथ रहता है।।
- सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X