जो लाए थे जहां में वो सब आज भूल गए।।
मिट्टी से क्या उठे के बस हर बात भूल गए।।
बुज़ुर्गों में बैठने की भी अब कहाँँ आदतें रही,,
नए पेड़ आज अपनी ही औकात भूल गए।।
बेशक़ बुरा कहो हमें मगर इतना अमल रहे,,
तुम भी हमारे साथ साथ जज़्बात भूल गए।।
दिल सोच सोचकर के अभी तक है रो रहा,,
दुनियाँ बदल गई है या वो हालात भूल गए।।
उन्हें ये फ़िक्र हैं के कोई कुछ कह ना दे उन्हें,,
हम सोचते ही रह गए वो हर बात भूल गए।।
दौलत कदे लौटकर तुम जब आओगे कभी,,
तब याद आएगा के तुम क्या बात भूल गए।।
हम तो चले यहां से हमें तो जाना ही था देव,,
तुम सोचना बाद ए जफ़ा क्या बात भूल गए।।
-सुनील देव
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