प्रत्येक भाषा का यहाँ, है अपना ही मान।
हिंदी रग-रग में बसी, यह हम सबकी जान।
सुनो मेरे यारों ज़रा, लाया हूँ यह बात।
भाषा बदले रोज़ जो, छोड़ न दे वह साथ
हेलो-हाय के चक्कर में, भूल गए 'प्रणाम'।
व्हाट्सएप की भाषा में अब, गुम हो रहे तमाम ॥
इंग्लिश, उर्दू, फ्रेंच का, दिल से करो सम्मान।
पर अपनी ही जड़ काट कर, बनना मत विद्वान ॥
हाथ मिलाओ शौक से, सीखो हर इक ज्ञान।
पर हिंदी की गोद में, पाओ सच्चा मान ॥
संस्कृत की गोख से, जनमी भाषा वीर।
तुलसी और कबीर ने, बदली इसकी तकदीर॥
शब्दों का यह बाग़ है, अक्षर-अक्षर फूल।
अपनी माँ को भूलना, है सबसे बड़ी भूल॥
इंग्लिश भी तुम सीख लो, दुनिया का लो ज्ञान।
पर हिंदी को भूलकर, मत खोना सम्मान॥
दिल की मीठी बात है, देती सबको प्यार।
भेदभाव को मिटाकर, जोड़े सब संसार॥
टीवी और सिनेमा में, बदला इसका रूप।
हिंग्लिश की इस धूप में, खोई छाँव अनूप॥
अखबारों से खो गई, इसकी शुद्ध मिठास।
आओ मिलकर हम करें, इसका नया विकास॥
मंचों पर भाषण में ही, सिमटा इसका मान।
चौदह सितंबर को ही, आता इसका ध्यान॥
दफ्तर और बाज़ार में, हो इसका व्यवहार।
तभी बनेगा देश यह, जग में सिरमौर यार॥
आओ मिलकर लें शपथ, छोड़ें झूठी शान।
हिंदी से ही बढ़ेगा, भारत का सम्मान॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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