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एक गाँठ

                
                                                         
                            जो एक बार भरोसा टूटा, तो फिर भरोसा बहाल क्या हो,
                                                                 
                            
ये दिल है कोई खिलौना तो नहीं, कि रोज़ इसका मलाल क्या हो।
दिखा के राहें बुलाने वाले, अँधेरे कुएँ में छोड़ आए,
गए जो उस पार डूब कर हम, तो इस किनारे पुकार क्या हो।

वो रेशमी तार जो दिलों का, ज़रा सी ठेस से टूट बैठा,
बड़ा जतन कर जो फिर से जोड़ा, तो बीच में गाँठ छोड़ बैठा।
वो गाँठ चुभती है साँस बनकर, कि अब कोई पास आ न पाए,
जो सीधे-सच्चे स्वभाव के हैं, उनसे यहाँ हर कोई रूठ बैठा।

लगाए बैठे थे जिनके काँधे पे सर, कि अपना कोई मिला है,
उन्हीं के हाथों में छल के पासे, तमाशा मेरा यहाँ खुला है।
चले थे बस्ती बसाने अपनी, मगर ये बाज़ार था पराया,
जो बिक चुका अपनी सादगी में, भला वो माँगे हिसाब क्या है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 सप्ताह पहले

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