मैं लिख सकती हूं सच्चे प्रेम को,
या यूं कहूं कि प्रेम की पराकाष्ठा को,
एकदम सटीक शब्दों में ,
और हां ढाई अक्षर से भी कम शब्दों में ,
और मेरे शब्द होंगे " मां "🫀।
"मां" संसार का सबसे सुंदर संबंध ।
और ईश्वर की बनाई सर्वोत्तम रचना है
हर किसी के जैसे मुझे भी लगता है
मेरी मां दुनियां की सबसे अच्छी मां है
वो कैसी है आज सब सच बताऊंगी
सिर्फ़ खूबियां ही नहीं कमियां भी गिनाऊंगी
एक कमी है उसकी उसे दिखावा नहीं आता
इस दिखावे भरी दुनियां में ढलना नहीं आता
वो जैसी है सबके सामने है
नाराज़गी हो या गुस्सा
उसे बहाना नहीं आता
जिसमें हर एक मंज़र झलकता साफ़ है
वो इक शख़्स है जो आईने की तरह साफ़ है
मग़र कभी कभी वो पत्थर में ढल जाती है
अपनी फ़ितरत से बहुत अलग नज़र आती है
रात दिन काम करने के बाद भी,
उसने कभी नहीं कहा कि आज थक गई हूं ,
अपना काम ख़ुद कर लो अब मैं कमज़ोर हो गई हूं
नानी कहती थीं "तेरी मां कुछ शौकीन हुआ करती थी,
उसकी हर चीज़ सुंदर और सलीके से रहा करती थी,
अपने कपड़े में ज़रा दाग भी पसंद नहीं आता था,
उसकी चीजों को कोई हाथ लगाए रास नहीं आता था"
मग़र अब वो कुछ और हो गई है ,
क्योंकि वो बेटी से मां हो गई है।
वो कभी नहीं कहती मेरे लिए नई साड़ी लाना ,
ये चूड़ियां पसंद नहीं आईं दूसरा रंग लाना ।
अब उसकी हर चीज़ बंट गई है,
यहां तक कि वो ख़ुद भी अपनी नहीं रह गई है ,
अब उसे किसी बात पर गुस्सा नहीं आता,
दुःखी होती है मगर रोना नहीं आता।
शीशे सी होकर भी पत्थर सी सब सहती ,
अपनी किसी बात को खुलकर नहीं रखती ।
अपनी पसंद नापसन्द मायने नहीं रखती ।
रोटी जब भी आधी मांगू वो पूरी बढ़ाती है
मेरी मां मुझे अक्सर अनपढ़ नज़र आती है
तिनका तिनका बस बच्चों के लिए जोड़ती हैं ,
अपना मन मारकर बस घर जोड़ती है ।
मैं समझ नहीं पाती ये खूबियां हैं या कमियां हैं
मगर जैसी भी है मेरी मां मेरे लिए दुनियां है
मुझे आज भी याद है मां की एक कहानी थी
मेरी नींद लाने के लिए उसने अक्सर दोहराई थी
मगर अब उसकी बातें हमें पसंद नहीं आतीं हैं
"तुम शांत रहा करो जब तुम्हें समझ नहीं आती है"
"तुम पुरानी हो गई हो मां" हम अक्सर कह जाते हैं ,
अब उस मां के ख़्याल उसके मन में ही रह जाते हैं ।
वो मां जिसके लिए बच्चे का पहला शब्द ही जरुरी रहता है,
एक रोज़ बच्चों के लिए उस मां को सब बताना ज़रूरी नहीं रहता है।
बच्चे बड़े और मां वक्त के साथ पीछे रह गई है,
बच्चे अपनी पढ़ाई, मां घर की रसोई में रह गई है ।
मग़र कभी कभी उसके भी ख़्याल बोलते होंगे,
किसी के सुनकर दिए जाने वाले जवाब ढूंढते होंगे।
मग़र तब उसे नज़र आता है कि सब व्यस्त हैं ,
कोई पढ़ाई,कोई कमाई तो कोई फोन में मस्त है ।
फ़िर वो समझाती है ख़ुद को यही सब ज़रूरी है
वो ममता का सागर होते हुए भी ख़ुद में अधूरी है....
- ऋतु बाजपेई"अपराजिता"
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