नदियों सा चंचल नहीं सागर सा ठहरा हो,
तरु के सुमनों सा नही नेह जड़ों सा हो।
अपूर्ण से पूर्ण शून्य से सम्पूर्ण हो,
व्योम सा नही रिक्त धरा सा परिपूर्ण हो।
न चाह हो न आह हो न स्वार्थ और गुमान हो,
स्नेह स्नेह स्नेह बस स्नेह और सम्मान हो।
गहरा गहरा ठहरा ठहरा जैसे मरुधर स्थिर हो ,
स्नेह हमारा ऐसा हो जैसे वचन युधिष्ठिर हो।
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